चित्र गूगल से साभार

वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।

आचरश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ।।मनु. ०२/०६।।


        मनुस्मृति सनातन धर्म का एक महनीय ग्रन्थ जिसे प्राचीन भारत का संविधान कहा जा सकता है । इसकी रचना आदि मानव महाराज मनु ने की तथा ब्रह्मा जी की आज्ञा से सप्तर्षियों को इसका प्रथम उपदेश किया । सप्तर्षियों में से महात्मा भृगु ने इसे धारण कर कालान्तर में इसका प्रचार–प्रसार किया । हजारों वर्षों तक यह ग्रन्थ अपने गौरव का विस्तार करता रहा । किन्तु बौद्धकाल में इस महाग्रन्थ को संस्कृतभाषा के जानकार बौद्धों ने दूषित करने का प्रयत्न किया । हालांकि मनुस्मृति की महत्ता व इसके बहुल प्रयोग के कारण वे इसमें आंशिक सफलता ही प्राप्त कर सके, वे इसके प्रायः उन्हीं अंशों को दूषित कर सके जिनका दैनिक जीवन में प्रयोग न के बराबर होता था इस कारण जिन अंशों को प्रायः गुरुकुलों में पढाया नहीं जाता रहा होगा । किन्तु आज उन दूषित अंशों को मूल संहिता से पृथक् कर सकना सम्भव नहीं है । अतः मनुस्मृति में कहीं–कहीं विरोधाभास भी दिखता है । आर्यसमाज के द्वारा मनुस्मृति के परिष्कार का एक स्तुत्य प्रयत्न हुआ है किन्तु वह सर्वमान्य नहीं हो सका ।
       इधर आजादी के बाद की सरकारों ने मनुस्मृति आदि ग्रन्थों को सनातन की व्यक्तिगत संपदा मानते हुए इसके अध्ययन–अध्यापन आदि पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया । यहाँ तक कि इस महत्तम ग्रन्थ के विषय में अपवाद ही फैलाये गये । उत्तर प्रदेश में बहुजन की उत्पत्ति के बाद तो यह ग्रन्थ नितान्त तिरस्कृत हुआ । अपढ़ों व दुराग्रहियों ने इसे अपने आक्रमण के केन्द्र में रखा, साथ ही जनश्रुतियों मात्र का आश्रय लेकर इसकी पदे–पदे आलोचना की । कुछ बुद्धिहीनों, विचारहीनों ने इसकी प्रतियाँ भी जलाईं । कुछ वर्षों तक बहुजन की पूरी राजनीति इसी ग्रन्थ को गाली देकर निम्नवर्गों को उच्चवर्गों से पृथक् करने तक सीमित रही । इसमें वे पर्याप्त सफल भी रहे । धीरे–धीरे समाज के निम्न वर्गों खासकर हरिजनों में वे यह धारणा डालने में सफल हुए कि ब्राह्मणों व उनके पूर्वजों ने मनुस्मृति का निर्माण किया तथा ऐसे नियम बनाये जिनमें शूद्रों के साथ दुर्व्यवहार किया गया । उन्हें ये लगने लगा कि द्विजों नें उनपर हजारों वर्षों तक अत्याचार किया और उनके सहारे ही जीवन के सुख भोगे जबकि उन्हें निम्नस्तरीय जीवन जीने पर विवश किया । हैरानी की बात यह है कि वर्गविशेष ने मनुस्मृति को जलाना‚ फाड़ना‚ गाली देना व इसके विरुद्ध कुप्रचार जारी रखा जबकि सत्य से परिचित कराने के लिये समाज का विद्वद्वर्ग आगे नहीं आया । इसका परिणाम यह हुआ कि बहुजनों ने मनुस्मृति को उनके साथ भेदभाव करने वाला ग्रन्थ सिद्ध करने में सफलता प्राप्त कर ली ।

तब से लेकर अब तक मनुस्मृति जैसी पवित्र संहिता समाज के तिरस्कार को ही झेल रही है । हालांकि कुछ विश्वविद्यालयों व परीक्षाओं में इसके कुछ अंशों को सम्मिलित किया गया है किन्तु वह भी मात्र संस्कृत विषय के एक अंश के रूप में ही । अतः आज आवश्यकता है इस ग्रन्थ के विषय में लोगों को जागरूक करने व इसकी सच्चाई को जन–जन तक पहुँचाने की । यह कार्य हम सनातनियों को ही करना है ताकि हमारे समाज के एक अंग में इसे लेकर जो मानसिकता फैल गई है उसका हम निराकरण कर सकें ।
        इसी क्रम में मैंने आज से विभिन्न सक्रिय माध्यमों (फेसबुक‚ टि्वटर‚ कू‚ एलीमेण्ट आदि) पर मनुस्मृति के कुछ श्लोकों का भावार्थ सहित नियमित प्रकाशन करने का संकल्प लिया है । यह कार्य श्रमसाध्य और समयसाध्य भी है अतः इसका प्रकाशन प्रतिदिन सम्भव नहीं हो सकेगा‚ फिर भी सप्ताह में इसपर कम से कम दो लेख अवश्य प्रकाशित करने का प्रयत्न करूँगा । साथ ही पाठकों की सम्बन्धित समस्याओं का निराकरण करने का भी प्रयास करूँगा ।
        ईश्वर मुझे इस महनीय संकल्प को पूर्ण करने की शक्ति व गति प्रदान करे

भवदीय
डॉ. विवेकानन्द पाण्डेय
संस्कृतजगत्

इति

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